Sunday, September 10, 2017

प्रद्युम्न हत्याकांड-दोषी कौन - प्रशासन या मानवता

             जिम्मेदार कौन शासन या मानव
हत्या किसी का हो चाहे दरभंगा के मनोज चौधरी का चाहे मधुबनी के नैंसी झा का या फिर गुड़गांव में प्रद्युम्न ठाकुर का, हत्यारा कोई हो, घटना हमारे देश के किसी हिस्से का हो पर मुझे पता नहीं क्यों हर बार ऐसा लगता है की हर हत्या-बलात्कार के साथ जनसमूह का ध्यानाकर्षण उस प्रत्यक्ष समस्या के तरफ नहीं जा रहा जो वास्तव में इन घटनाओं का कारक है । जो है गिरता हुआ मानवता,मनुष्यता और पशुता में बढ़ती समानता,एक दुसरे के प्रति संवेदनहीनता। हर बार जिस शासन-प्रशासन,सत्ताधीश को एक झटके में उस हत्या का जिम्मेदार मान लेते हैं क्या वहीं सही है ? क्या इन अमानवीय कृत्यों को सुधारना किसी शासन व्यवस्था सत्ताधीश से सम्भव भी है ?

बलात्कार कल भी हुआ आज भी होगा कल भी होगा ,हत्याएँ कल भी हुआ आज भी होगा कल भी होगा पर क्या इन हत्याओं बलात्कारों को रोकना मात्र इस शासन-प्रशासन व्यवस्था से सम्भव है ?
जब आप पुर्ण व्यहारिक हो के सोचेंगे तो आपको आभास होगा की वास्तव में इस शासन-प्रशासन व्यवस्था की आवश्यकता तब हीं पड़ता है जब कोई मानव पशुता दिखाता है।
अब सवाल है कि हम शासन व्यवस्था पर तो एक झटके में दोष मढ़ देते हैं पर कभी ये सोचते हैं कि इस व्यवस्था पर सवाल खड़ा करने की नौबत क्यों आया और वो नौबत ही नहीं आए इसके लिए कितने लोगों ने आवाज बुलंद किया है ?
सभी समस्याओं का जड़ मनुष्य में मनुष्यता का पतन और पशुता का वर्धन है। इन्हीं अमानवीय अवगुणों के कारण हमें किसी तथाकथित शासन -व्यवस्था की आवश्यकता होती है ।

धरातल पर लौटिये हत्या मनोज चौधरी का भी हुआ पेट्रोल डाल कर जिन्दा जला कर ,हत्या नैंसी झा का भी हुआ ,हत्या एकाध दिन पूर्व प्रद्युम्न का भी हुआ ।
एक-एक हत्याकांड को देखिए क्या किसी घटना में आप पुलिसिया-व्यवस्था,न्यायिक व्यवस्था, सत्ताधीश के कार्रवाई से संतुष्ट हैं ?

मनोज चौधरी हत्याकांड का न्यायालय में दलालों के द्वारा लीपापोती हो चुका है ,नैंसी हत्याकांड में पुलिस जाँच में सब कुछ उतना हीं स्पष्ट है जितना आरुषि और जेसिका हत्याकांड में स्पष्ट हुआ , प्रद्युम्न हत्याकांड के लिए लोग हरियाणा सरकार,स्कूल प्रशासन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। निश्चय हीं लोगों का गुस्सा न्यायव्यवस्था के प्रति ,पुलिस के कारवाई के प्रति,हरियाणा सरकार के प्रति या फिर स्कूल प्रशासन के प्रति जायज और स्वाभाविक है लेकिन इन सभी घटनाओं के प्रति इस व्यवस्था की आवश्यकता तब पड़ी है जन कोई मानव एक मानव के लिए दानव बन गया यहीं सच्चाई है सम्पुर्ण सच्चाई।
अब सभी हत्याकांड में एक मिनट के लिए शासन-व्यवस्था के अभी तक हुए कार्रवाई जो सही है या गलत को भुल जाइये और ये सोचिए -

मनोज चौधरी को दिन दहाड़े पेट्रोल डालकर जिन्दा जलाने वालों के मन में कभी ये विचार आया कि मैं जिसे जिंदा जला रहा हुँ वो भी इसी हाड़ मांस के शरीर का मालिक है , आखिर एक मनुष्य किस हृदय से किसी मनुष्य को यूँ पेट्रोल डालकर जिंदा जला सकता है । आखिर किसी मनुष्य के दिल में एक मनुष्य के लिए इतनी क्रूरता आ कहाँ से जाता है ? क्या ये भी मानव हीं हैं ? क्या हर दुकान पर एक पुलिस का ड्यूटी लगाना सम्भव है ?

नैंसी झा की हत्या किसने किया ये आजतक स्पष्ट नहीं हुआ जिसके लिए हम शासन व्यवस्था को दोषी ठहरा रहे हैं ठहराना भी चाहिए लेकिन क्या कभी आपने ये सोचा है कि जिन हाथों ने एक 12 साल के मासूम बच्ची की इतनी निर्ममता पूर्वक हत्या कर दिया उन हाथों में इतनी क्रूरता कहाँ से आ जाता है एक मासुम बच्ची के लिए ? क्या हर मासुम के सुरक्षा के लिए एक पुलिस को बहाल कर पाना सम्भव है ?

गुड़गांव में 8 वर्षीय प्रद्युम्न ठाकुर जिसकी हत्या रेयान इंटरनेशनल स्कुल के ड्राइवर ने कुकृत्य में असफल होंने पर कर दिया क्या ऐसे लोग मानवता नाम मात्र के लिए खतरा नहीं है ,उस व्यभिचारी के मन में ये एक बार भी क्यों नहीं आया कि जिस बच्चे की हत्या वो इतना क्रूरता से करने जा रहा है वास्तव में उसे उस क्रुरता का आभास भी नहीं है वो इस बात से परिचित भी नहीं है कि दुनिया में इस प्रकार के लोग भी होते हैं और इस दुनिया की कुंठित मानसिकता इस हद तक भी जा सकता है। आखिर कोई व्यक्ति इतना बड़ा दानव कैसे बन सकता है कि एक 8 साल के अबोध बच्चे की हत्या इस प्रकार से करता है कि उसके गर्दन ,कान ,सांस नली ,और ग्राह नली तक को काट कर उस बच्चे को इस रूप में ला देता है कि देखने मात्र से किसी का रुह काँप जाए ।
वास्तव में समाज को आवश्यकता है एक मानसिक क्रांति की जिसमें मनुष्य को जीवन का मोल का आभास हो ,जिसमें व्यवहारिक जीवन में एक दूसरे के प्रति प्रेम केे महत्व का आभास हो, जिसमें बच्चों को समाज का ,देश का भविष्य होने का आभास हो ना की अपनी कुंठित मानसिकता के लिए सॉफ्ट टारगेट का । यदि ऐसा नहीं होता है तो आप ऐसा उम्मीद भी नही करिये की हर जगह की सुरक्षा हमारा शिथिल शासन-व्यवस्था सुनिश्चित कर लेगा ये ढकोसला लगता है ।

Wednesday, July 26, 2017

"बाबाक संस्कार" -एक बार फिर से ..


पूरी कहानी को पढ़ेंगे तो आपको मनगढंत और काल्पनिक लगेगा हालांकि मुझे इससे कोई ऐतराज नहीं है इस प्रकार की कहानियां काल्पनिक कथाओं में हीं तो आज तक पढ़ा होगा आपने ,पर मेरा विश्वास करिये बाबा को अभी तक मुखाग्नि भी नहीं मिला है :-

गाँव के बाबा दो साल से मौत के लिए जंग लड़ रहे थे क्योंकि जिंदगी के लिए जँग किसके लिए लड़ते उनके परिजनों को उनकी जरूरत सालों पहले समाप्त हो चुका था ,आज अन्ततः जिन्दगी की जंग हार गए और खुद जीतकर इस समाज के वार्तमानिक परिपेक्ष्य पर और पशु समूह रूपी मुखड़ों के ऊपर अनगिनत तमाचे लगा कर गए ,उसको उसके वास्तविक औकात से परिचित करवा कर गए ।

 वो तो अधिक से अधिक चार-पाँच साल और अपने जीवन को जी सकते थे यदि उन्हें उचित देखभाल ,पारिवारिक स्नेह और दवा दारू मिलता ,पर उन्हें तो माध्यम बनना था समाज को उसके इस गंदी असलियत से परिचित करवाने का सो भगवान ने भी सहायता किया और आज सुबह अपने कष्टमय जीवन से मुक्ति प्रदान कर दिये बाबा को और बाबा सिधार गए ।

अब आप जब उस सड़क से निकलेंगे तो सड़क के किनारे उनके उस शमशान नुमा दरवाजे पर बाबा के अधढ़के शरीर के लिपटे हुए कपडों में से गुह्य अंग नहीं दिखेंगे ,उनके सूजे हुए सर्वांग शरीर नहीं दिखेंगे ,उनके हृदय विदीर्ण करने वाला कराहने की आवाज नहीं सुनेंगे ,उनके 'पानी माँगने' की शर्मनाक स्थिति से दो चार नहीं होना पड़ेगा,रेअर्ली उनके पास खड़ी रहने वाली औरतों का समूह नहीं देखेंगे जो उनके हाल को देखकर उनके कलामी बेटों को 'आशीर्वाद' देती रहती थी  । उनको देखकर आपका में से कुछ लोगों का खून खौल के जो थोड़ा सा कम हो जाता था वो खून अब नहीं जलेगा और इसीलिये आपके शरीर से खून की मात्रा कम भी नहीं होगा क्योंकि अब बाबा नहीं रहे । वो   जो आप उनके हाल को देखकर अत्यंत दुःखी हो जाते थे आप का ये दुख उनसे नहीं देखा जाता था और इसीलिए वो देह त्याग दिए ।

3-4 साल पहले उनकी जीवन संगिनी उनका साथ छोड़ चल बसी लगभग इसी गति को उन्होंने ने भी प्राप्त किया था ,लगभग इसलिए क्योंकि उनके लिये बाबा थे । बाबा बड़े कर्मठ थे आज से दो साल पूर्व तक जब वो चलने-फिरने में सक्षम थे तो खाना भी बना लेते थे वहीं कोई 80 साल उम्र होगा उनका । पर जब वो खाना बनाने लायक नहीं बचे तो गाँव के एक जागरूक व्यक्ति ने महीनों उनको खाना पीना का व्यवस्था किया । बीच-बीच में कई बार जब कुछ लोगों से हालात बर्दाश्त नहीं होता था तो अपने खर्चा से बाबा का इलाज भी करवाए पर बाबा ठहरे बाबा ,सो थोड़ा सा भी उठ के खड़ा होने लायक बनने पर बाबा सीधे चल पड़ते थे मेरे घर के पीछे वाले बारी झारी की देखने अपने बटाईदार को उचित निर्देश देने ,अपने गाछी बिरछी में पेड़ों के संख्या गिनने कहीं किसी पेड़ की संख्या कम तो नहीं है ,किसी पतखरनी ने नव गोछली में से टुन्नी तो नहीं तोड़े आदि आदि जानने को । पर काश कोई बारी झारी , कलम-गाछी उनके काम आ पाता । पर हाँ वो पेड़ जिनका एक टुटा हुआ डाली बाबा को विचलित कर देता था आज आखिरी समय में उनके काम आएगा उनके दाह संस्कार में ।

बांकी वो सारे जमीन जायदाद ,कलम गाछी बाबा के उन्हीं कलामी चारों बेटों का उसी बाप का दिया हुआ सम्पति है जिस बाप को वो जीवन के सबसे कठिन परिस्थितियों में एक वक्त का समुचित खाना नहीं खिला पाए । वो कभी उस उस बाप का इलाज नहीं करवा पाए जिस बाप नें अपना पेट काट कर उन्हें उस स्तर पर पहुंचाया जिस स्टैंडर्ड में बाबा उनके लिए फिट नही बैठ रहे थे ।

आप को लग रहा होगा कि बाबा के सारे बेटे कोई जिन्दगी काटने वाला जॉब कर रहे होंगे और उस जिंदगी काटने वाले जीवनयापन में से इतना नहीं बचा पाते होंगे कि बाबा के लिए कुछ व्यवस्था कर पाते ,वो ऐसे झुग्गियों में रहते होंगे जहाँ वो बाबा को एडजस्ट नहीं कर सकते थे । जरा रुकिये क्या सोचे जा रहे हैं ? इससे पहले कि आप कुछ और सोच ले मैं बता दूं  की बाबा के सारे बेटे गवरमेंट जॉब करते हैं ,सभी लगभग बीसीयों साल से फुल फैमिली शहरों में रहते हैं  सिवाय एक छोटी बहु के ,और सरकारी नौकरी के नाम पर कोई के नाम पर कोई चपरासी गिरी नहीं करते हैं सभी स्तर के पदाधिकारी हैं कोई रेलवे के के सिग्नल सेक्शन में सीनियर इंजीनियर हैं तो कोई भूमि विभाग के बड़े अभियंता है एक किसी निजी क्षेत्र की कम्पनी में बहुत बड़े पदाधिकारी है ।

उनके कुछ बेटा बेटियां विदेशों में भी पढ़ते हैं । शहर में इस कदर अभ्यस्त हो गए हैं कि उनके बेटों की शादियाँ भी वहीं होते हैं गांव से कोई सपंर्क नहीं । हाँ पर कभी कभार साल में एकाध बार अपने निजी गाड़ी से गाँव आते हैं ,गाँव के पैतृक संपत्ति के बारे में अधितर लोगों का सोचना होता है कि अगर समय समय पर उसका देखभाल नहीं किया जाए तो फलां आदमी हड़प सकता है वो भी शायद कुछ इसी प्रकार के सोच के संग आते होंगे । पर कभी तीसरे दिन गाँव मे नहीं देखा उनको । खैर अब पूरे कहानी को पढ़ कर आप सोच रहे होंगे कि कुछ नहीं किया इन्होंने अपने माँ बाप के लिए ,आप गलत सोच रहे हैं माँ के लिए भी पूरे परम्पराओं के संग श्राद्ध कर्म किया था इन्होंने ने पंडीजी की खूब दक्षिणा दिए खूब भोज भात भी किये जिसके लिए खूब जयजयकार हुआ था इनका ।

अब पिताजी का भी करेंगे पूरे तत्परता के सँग पिताजी के दाह संस्कार होगा ,हो सकता है अधिकतर पुत्रजन फ्लाइट से गाँव आएं । पूरे विधि विधान के सँग बाबा का श्राद्ध होगा ताँबा और पीतल के बड़े बड़े बर्तन पंडीजी को दान दिया जाएगा , खूब बड़ा भोज होगा ,'हस्ति और नाम' के हिसाब से रसगुल्ला का जयवारी भोज भी कर सकते हैं ,गाँव को कम से कम तीन दिन तो खिलाएंगे हीं खूब जयजयकार होगा बाबा के श्राद्ध में इतने ब्राह्मण खाएंगे तो बाबा के आत्मा को भी पूरी शांति मिलेगी ही बाबा स्वर्ग को जाएंगे । और क्या चाहिए था बाबा को अपने उस बेटों से जिनके पढ़ाई का खर्चा कई बार उन्होंने ने घर के चूल्हे को ठंढा रख कर किया था ।

(उपरोक्त कहानी किसी व्यक्ति विशेष के ऊपर नहीं लिखा गया है, यदि यह कहानी किसी व्यक्ति से मिलता जुलता है तो यह संयोग है। कहानी पूरे समाज की सच्चाई को प्रदर्शित करने हेतु लिखा गया है। कहानी में समाज के वर्तमान स्थिति और कुछ आवश्यक काल्पनिकता को शामिल किया गया है)

बाबा की जय हो !!
उनके बेटों की जय-जयकार हो !!

Friday, April 7, 2017

'प्रतीक्षित भेंट' मैथिली में -Dhiraj kumar jha

मिथिलांचलक परिवेश में कतौ 'सरप्राइज' शब्द सूटेबल होई (ककरो वस्तुरुपी गिफ्ट देबय चाहै छी त ओ अपवाद छैक )। इ बात त हमरा पूर्वे सं बुझल छल आई पूर्ण रुपेन आश्वस्त केला हमर फेसबूकिया अराध्य प्रवीण जी 'सर'प्राइज दय के ।ओना त कतेको फेसबूकिया मित्र छैथ जिनका सं प्रत्यक्ष दर्शनक प्रतीक्षा में हम सालों स छी। मुदा हिनका सं भेट करबाक इच्छा किछु बेसिये अई। कै बेर भेंट करैत करैत चुकलौं हं ।काल्हुक घटना देखियौ समय लगभग 12:40 हम किछु आवश्यक काज स गामसं तीन-चैर किलोमीटर दुर रुपनगर में रही ।"praveen ji fb'' अही नम्बर सं फ़ोन अबैत अछि नमरे देख हम हिय हारलौं ।मोने मोने बडबडाइलौं -'करिह बड़का भेंट गेल एगो और मौका ' .फोन रिसीव केलों आवाज अबैछ "हेलो धीरज बजै छि ?हम प्रवीण"(एहने शब्दक इच्छा हम पूर्व में केने रही पूरा केलैन) .हम सकपकैत आवाज म 'हहं गोर लगै छी '.। शुरू भेलै सब बात हमरा अपेक्षा अनुसार(सिवाय एकरा जे भेंट होइतै )-"कतय छी? ?अहाँ के गाम मं छी जयंतीपुर रोड में हमर भाई सेहो संग छैथ " ।घोर निराशा के भाव में डूबकी लगबैत कहलियैन गाम सं किछु दूर रूपनगर में छी ।चूँकि बहुत व्यस्तता में छैथ से हमरा पूर्वे सं बुझल छल तैं एहेन आग्रह नै कय सकलहूँ जे 'रुकु ओतय 15-20 मिनट '। खैर दूई चैर मिनट मिनट केर बातचीत में आशवस्त केलेन जे भेटै छी रैब दिन । एकटा प्रतीक्षित भेंट किछ आओर दिनक प्रतीक्षा में बदली गेलै ।आ एकबेर आओर पुराण कहबी 'इन्तेजार की घड़ी लम्बी होती है'चरितार्थ भेलै।।वास्तव मं फेसबुक ओ स्थापित समाजक रुप लेने जा रहल छै जतुक कतेको काका भैया चाचा सं ओहि समाजक भाय भतीजा प्रत्यक्ष भेंट करय चाहैत छैक।।रोमियो सबहक सन्दर्भ में इ बात किछु बेसियन्त सूटेबल होइछ "आह इ मोहतरमा जं कहियो राज कैंपस या श्यामा माई मंदिर में भेट जैतैक" ।।.खैर हम त कुशल मंगल रहब त इ प्रतीक्षित भेंटक प्रतीक्षा रैब दिन समाप्त भ जेतैक । #प्रतीक्षितभेंट

 08/04/2017

Wednesday, March 29, 2017

मिथिलांचल में कीर्तन भजन की स्थिति

मेरे गाँव दाथ में पिछले 10 मार्च को रामकृष्ण नामधुन नवाह आरंभ हुआ।लगभग 10 हजार जनसँख्या मात्र उस पुवारीटोल का है जहाँ मैं रहता हूँ बांकी 7 टोल का है पूरा दाथ । ये नवाह लगभग 10 साल पहले प्रत्येक वर्ष आयोजित होता था ।और सारे ग्रामीण मिलकर तन मन धन से सहयोग कर के इस कार्यक्रम को आयोजित और संचालित करते थे । परन्तु जब उपरोक्त सभी सहयोग और एवं लोगो की दिलचस्पी कम हो गया तो ये कार्यक्रम 10 साल तक बंद रहा ।इस बार कुछ सक्रिय भजन कीर्तन अनुरागियों जैसे स्वयं मेरे पिताजी ,लखन जी दादा ,छितन जी ,संतोष जी ,विषुण नेता जी,हीरा फौजी और कुछ अन्य लोगों ने निश्चय किया की इस परम्परा को इस वर्ष पुनर्जिवित करना है ।ऐसा ही हुआ भी .परन्तु आज ये सभी लोग इस कार्यक्रम के सफल समाप्ति के लिये चिंतित हैं । कारण जानकर आप हैरान हो जाएंगे कारण है शेष ग्रामीणों की निष्क्रियता जो उन्हें कीर्तन स्थल ठाकुरवारी तक नही ले जा पाता है । फलस्वरूप उपरोक्त नेतृत्वकर्ताओं के दिनचर्या को देखिये ,मेरे पिताजी समेत सभी लोग लगभग पूरी रात जागते हैं ,दिन को 2 से 3 घंटे सोने के बाद दैनिक क्रिया और फिर 2 से 3 घंटे विभिन्न सामान्य घरेलु कार्य करते हैं।।पुनः उन्हें जल्दी ठाकुरवारी पहूचना है।। क्योंकि लड़कियां अब थक चुकी होंगी । सुबह से वही लोग तो कैसे भी समय को आगे बढा रही हैं ।और बार बार उसी साउंड सिस्टम से बोल रही हैं "अहाँ सब जल्दी आबियौ ,हम सब बड़ी काल स अहाँ सब के बजा रहल छी " ।अतः वहां भी जल्दी पहुंचना है ।ऐसा नही है की कीर्तन का समय सारणी बनाकर समब्न्धित लोगों को बताया नही गया है की इतने बजे से इतने बजे आपको यहाँ आकर कीर्तन ।पर कलियुग है सो जिस काम से लोगों को प्रत्यक्ष लाभ नही मिले वो काम बेकार ।दो दिन पूर्व अच्छा खासा बारिश हुआ था ,खेतों में पर्याप्त हाल (नमी) है अतः मेरे पिताजी समेत बहुत लोग करीब 10 बजे खेतों में मुंग बाउग (बोने) करने गये ,अभी तक वापस नही लौटे हैं ।लगभग 2 बज रहा है लडकियाँ आपस मे अदला बदली कर के सुबह 6 से लगी हुई हैं । इसी बीच आज ज्ञात हुआ की कोई मिलन सरकार हैं सहसराम (बिरौल)के मात्र 200 ₹ भाड़ा लेते हैं एकदिन कीर्तन करने को बहुत सारे गाँव जैसे नेउरी ,मझौरा आदि गाँव में जाते हैं कीर्तन करने के लिए भाड़ा पर ।खैर अब सोचता हूँ की कहीं ये कहानी उसी मिथिलांचल का तो नही है जिसे मोदलता ,स्नेहलता ,विद्यापति ,मधुप जी का धरती माना जाता है ।